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बुढ़ापे में अपने जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहना, हैरानी की बात है कि उन्हें आपसे दूर कर सकता है।

यह कहानी ढाई हजार साल पुरानी है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे यह आज के दौर, हमारे माता-पिता और हमारी औलाद के लिए ही लिखी गई हो।

JHVP BHARAT NEWS / बिहार

EDITED BY : परवेज़ आलम भारतीय

“बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहना, हैरानी की बात है कि उन्हें आपसे दूर कर सकता है।”

यह कहानी ढाई हजार साल पुरानी है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे यह आज के दौर, हमारे माता-पिता और हमारी औलाद के लिए ही लिखी गई हो।

यह किस्सा ली वेई नाम के एक बूढ़े आदमी का है, जो महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस के पास एक सवाल लेकर गया, जो आज भी बहुत से बुज़ुर्गों को परेशान करता है:

“अपनी पूरी ज़िंदगी औलाद के लिए लगा देने के बाद भी, हम बुढ़ापे में खुद को अकेला क्यों महसूस करते हैं?”

वह प्याला जो कभी नहीं भरता…

ली वेई कोई बुरा पिता नहीं था। बल्कि उसने अपनी औलाद के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। उसने बहुत मेहनत की ताकि उन्हें कभी किसी चीज़ की कमी न हो। जब बच्चे बड़े हो गए, अपने घर बसा लिए और अपनी ज़िंदगी जीने लगे, तो ली वेई ने सोचा अब आराम का समय है। उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के पास रहने चला गया, यह सोचकर कि अब वह प्यार और अपनापन पाएगा।

 

लेकिन उसे वह खुशी नहीं मिली जिसकी उसे उम्मीद थी। घर भरा हुआ था, लेकिन उसका दिल खाली था।

 

सब लोग दिन भर व्यस्त रहते, शाम को थक कर आते और सुकून चाहते। वे उसकी बातें आधे मन से सुनते, उसके सुझावों से चिढ़ जाते और उसकी मौजूदगी को बोझ समझने लगे।

 

वह जितना करीब आने की कोशिश करता, वे उतना ही दूर होते गए।

ली वेई ने कन्फ्यूशियस से कहा:

“गुरुजी! मैंने अपनी ज़िंदगी बच्चों के लिए दे दी। सोचा था उनके साथ रहकर सुकून मिलेगा, लेकिन मैं खुद को उनके बीच नापसंद महसूस करता हूँ। ऐसा क्यों?”

कन्फ्यूशियस ने उसे तीन आसान सबक़ सिखाए।

पहला सबक: पानी का बर्तन

उन्होंने एक बर्तन को पानी से भर दिया और पूछा:

“अगर इसमें और पानी डालूँ तो क्या होगा?”

ली वेई ने कहा: “यह छलक जाएगा।”

 

कन्फ्यूशियस बोले:

“बिल्कुल, रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। जब हम खुद को ज़बरदस्ती किसी ऐसी जगह डालते हैं जो पहले से भरी हो, तो संतुलन बिगड़ जाता है। तुम अपने बच्चों के घर में फिर से केंद्र बनना चाहते हो, लेकिन अब उनकी ज़िंदगी और उनके बच्चे ही उनका केंद्र हैं।”

 

दूसरा सबक: दो पेड़

उन्होंने पास के दो पेड़ों की ओर इशारा किया।

“जब पेड़ बहुत पास-पास होते हैं तो क्या होता है?”

ली वेई ने कहा: “वे एक-दूसरे को रोकते हैं और कमजोर हो जाते हैं।”

कन्फ्यूशियस ने कहा:

“ज़िंदगी में भी यही होता है। ज़्यादा नज़दीकी भी समस्या बन जाती है। बढ़ने के लिए जगह ज़रूरी है।”

तीसरा सबक: मुट्ठी भर रेत

कन्फ्यूशियस ने रेत को कसकर मुट्ठी में पकड़ा।

“अब क्या होगा?”

ली वेई ने कहा: “रेत फिसल जाएगी।”

कन्फ्यूशियस बोले:

“रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। प्यार दबाव से नहीं टिकता। जितना तुम पकड़ने की कोशिश करोगे, वह उतना दूर जाएगा। आज़ादी दो, तो वह खुद तुम्हारे पास रहेगा।”

कन्फ्यूशियस ने पूछा:

“जब तुम पेड़ लगाते हो, क्या यह सोचते हो कि वह तुम्हें छाया देगा?”

ली वेई ने कहा: “नहीं, मैं उसे बढ़ने के लिए लगाता हूँ। छाया तो एक तोहफा होती है।”

कन्फ्यूशियस ने कहा:

“तो अपनी औलाद से अलग उम्मीद क्यों रखते हो? तुमने उन्हें अपने लिए नहीं, दुनिया के लिए पाला है।”

ली वेई को सच्चाई समझ आ गई।

कन्फ्यूशियस ने कहा:

“अभी भी तुम नई शुरुआत कर सकते हो। प्यार मांगो मत, बल्कि ऐसा काम करो जिससे तुम्हें खुशी मिले।”

ली वेई अपने शहर वापस गया, एक छोटा सा घर लिया और बच्चों की मदद करने लगा। वह कहानियाँ सुनाता, पेड़ लगाता और लोगों के काम आता। लोग उसे “मास्टर ली” कहने लगे।

वह जितना कम दबाव डालता, लोग उसे उतना ही ज़्यादा मान देते।

वह जितनी कम ध्यान की मांग करता, उसे उतना ही सच्चा प्यार मिलता।

एक दिन उसे अपने बेटे का खत मिला:

“बाबा, हमें आपकी याद आती है। बच्चे आपके बारे में पूछते हैं। आइए, हमारे साथ कुछ समय बिताइए।”

जब ली वेई वहाँ पहुँचा, तो उसका गर्मजोशी से स्वागत हुआ। उसे पहली बार लगा कि वह बोझ नहीं, बल्कि एक प्यारा मेहमान है।

उसे समझ आ गया:

जब उसने प्यार की उम्मीद करना छोड़ दी, तो प्यार खुद उसके पास आ गया।

 

बुढ़ापे में औलाद के साथ रहना माँ बाप से ज़्यादा औलाद की ख़ुशनसीबी है, लेकिन सच्ची नज़दीकी आज़ादी से आती है, ज़बरदस्ती से नहीं।

जब हम रिश्तों पर दबाव डालते हैं, तो वे कमजोर हो जाते हैं।

जब हम आज़ादी देते हैं, तो लोग हमें दिल से चुनते हैं।

JHVP BHARAT NEWS

Parwez Alam: Editor in chief : JHVP BHARAT NEWS : A Passionate Soul with a Drive for Change Born on January 26, 1983, Parwez Alam is a dynamic individual with a multifaceted personality. With a postgraduate degree in hand, Parwez has always been drawn to the world of journalism and social work, driven by a desire to make a positive impact on society. When he's not working, Parwez indulges in his favorite hobby - cricket. An avid player, he finds solace in the thrill of the game. But that's not all - Parwez is also a creative force to be reckoned with. He enjoys writing stories, composing poems, and expressing himself through words. Parwez's passion for social justice is evident in his work as a political activist. He is an outspoken advocate for change and uses his voice to raise awareness about important issues. In today's digital age, he leverages social media platforms to spread his message and connect with like-minded individuals. Through his various pursuits, Parwez Alam embodies the spirit of a true change-maker. His dedication to journalism, social work, and political activism is inspiring, and his creative side makes him a unique and fascinating individual. 9931481554, 9709287354,6202433405,9097947125,7870527125

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