THINK IT SIR :Nसरकार की यह पॉलिसी पड़ गई उलटी, टॉप इकोनॉमिस्ट ने कहा- कड़वे सच को स्वीकार करना होगा
उनके मुताबिक, इस समस्या की जड़ में 2015 की एक निवेश संधि है। नई दिल्ली को इस 'खामियों वाले सिस्टम' को सिर्फ सजाने-संवारने के बजाय इंडोनेशिया से सही सबक सीखना चाहिए।

JHVP BHARAT NEWS / NEWS UPDATE
EDITED BY: PARWEZ ALAM
नई दिल्ली: भारत खुद को दुनिया के सबसे बड़े इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन के तौर पर पेश करता है। लेकिन, जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला का कहना है कि भारत को एक कड़वे सच को स्वीकार करना होगा। IMF में भारत, बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुरजीत भल्ला ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में अपने एक लेख में कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में कई सालों से गिरावट आ रही है। इसकी वजह ग्लोबल अनिश्चितताएं नहीं हैं। उनके मुताबिक, इस समस्या की जड़ में 2015 की एक निवेश संधि है। नई दिल्ली को इस ‘खामियों वाले सिस्टम’ को सिर्फ सजाने-संवारने के बजाय इंडोनेशिया से सही सबक सीखना चाहिए।
2015 की इन्वेस्टमेंट ट्रीटी का किया जिक्र
IMF के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर ने समझाया कि यह भारत के विवाद-समाधान ढांचे को लेकर निवेशकों की चिंताओं का संकेत है।
सुरजीत भल्ला जिस 2015 की निवेश संधि की बात कर रहे हैं, वह आखिर है क्या?
2015 का ‘इंडिया मॉडल बाइलेट्रल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी’ (Model BIT) ‘व्हाइट इंडस्ट्रीज’ मध्यस्थता मामले की वजह से अस्तित्व में आया था। इस मामले में भारतीय अदालतों की ओर से कई सालों तक विवाद का निपटारा न कर पाने के बाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को मामला सौंपा गया था।
भल्ला ने कहा, ‘इस शर्मिंदगी पर भारत की प्रतिक्रिया यह थी कि उसने 2025 में एक नया ‘Model BIT’ पारित किया। यह किसी भी सरकार की ओर से पारित अब तक का सबसे ज्यादा रिस्ट्रिक्टिव मॉडल है जो ‘रक्षात्मक राज्य संरक्षण’ का नमूना है।’
क्या कहती है यह संधि?
इस संधि के अनुसार, निवेशकों के लिए यह जरूरी है कि वे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का सहारा लेने से पहले देश के भीतर उपलब्ध सभी कानूनी उपायों को आजमा लें।
उन्होंने कहा, ‘कोई भी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता शुरू होने से पहले भारतीय अदालतों में साठ महीने बिताने पड़ते हैं। यह कोई सुधार नहीं था – बल्कि यह तो एक तरह की पीछे हटने वाली नीति थी।’
सरकार की पॉलिसी पड़ गई उलटी
भल्ला के अनुसार, मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) के इस दावे के बावजूद कि इस नीति का ‘असर कम या बिल्कुल नहीं’ होगा, ऐसा लगता है कि निवेशकों के भरोसे के मामले में यह पॉलिसी उलटी पड़ गई है।
उन्होंने कहा कि:
- भले ही भारत ने 2025-26 में 43 अरब डॉलर का ‘इनवर्ड FDI’ (देश में आया निवेश) दर्ज किया हो।
- लेकिन, भारतीय कंपनियों की ओर से किया गया ‘आउटफ्लो’ (देश से बाहर गया निवेश) 33.3 अरब डॉलर रहा।
- इससे ‘शुद्ध एफडीआई’ में काफी कमी आई।
- जीडीपी में इसका शुद्ध हिस्सा 2000 के दशक के मध्य के बाद से अपने सबसे निचले स्तर लगभग 0.7% पर आ गया।
इंडोनेशिया का दिया उदाहरण
इंडोनेशिया में एक नए विवाद-समाधान ढांचे की शुरुआत भी काफी हद तक भारत जैसी ही परिस्थितियों में हुई थी।
2014 में इंडोनेशिया ने अपनी कई ‘द्विपक्षीय निवेश संधियों’ (BITs) को खत्म करने और उनकी जगह एक नया ढांचा लागू करने का फैसला किया। यह फैसला ‘चर्चिल माइनिंग’ और ‘न्यूमोंट’ जैसी विदेशी खनन कंपनियों से जुड़े एक विवाद के बाद लिया गया था।
जकार्ता के अधिकारियों ने जाली दस्तावेजों और स्थानीय साझेदारों व सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से हुए भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया। इंडोनेशिया मध्यस्थता में सफलतापूर्वक अपना बचाव करने में सक्षम रहा।
इसके बाद देश ने एक BIT पॉलिसी अपनाई जिसमें मध्यस्थता से पहले 12 महीने की ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि, तीन सदस्यों वाला एक निष्पक्ष मध्यस्थता पैनल और अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान तक निरंतर पहुंच शामिल थी।
यह हुआ इंडोनेशिया को फायदा
- इससे न केवल निवेशकों का भरोसा बढ़ा, बल्कि एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) का प्रवाह भी तेज हुआ।
- सुधारों के बाद 2015 से पहले के 14 अरब डॉलर सालाना के मुकाबले आने वाला एफडीआई बढ़कर लगभग 20 अरब डॉलर प्रति वर्ष हो गया। नेट एफडीआई जीडीपी के 1.1 फीसदी से बढ़कर जीडीपी के 1.4 फीसदी तक पहुंच गया।
नजरिये में अंतर की ओर किया इशारा
भल्ला ने विवाद समाधान के मामले में दोनों देशों के नजरिये के बीच के मुख्य अंतरों की ओर भी इशारा किया।
उन्होंने कहा, ‘इंडोनेशिया ने कानून के शासन और आंतरिक व्यवस्था को दुरुस्त करने पर दांव लगाया। उसने देखा कि निवेश का प्रवाह तेजी से बढ़ा। भारत ने एक दोषपूर्ण व्यवस्था को नए कागजी लिबास में लपेटकर उसे ‘सुधार’ का नाम दे दिया। पूंजी ने भी उसी के अनुरूप प्रतिक्रिया दी।’
टॉप इकोनॉमिस्ट के अनुसार, जब कोई देश दुनिया को यह भरोसा नहीं दिला पाता कि 20 लाख डॉलर के मध्यस्थता निर्णय का सम्मान बिना किसी दशक भर चलने वाले अदालती ड्रामे के किया जाएगा तो एफडीआई के बही-खाते में दर्ज आंकड़े कोई रहस्य नहीं रह जाते। वे एक स्पष्ट निर्णय होते हैं।
गहराते निवेश संकट की ओर कर चुके हैं आगाह
हालांकि, यह पहली बार नहीं था जब भल्ला ने भारत को गहराते निवेश संकट के प्रति आगाह किया हो। इंडिया टुडे टीवी के साथ एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार के लिए अपनी दिशा सुधारने का अब सही समय आ गया है।
भल्ला ने जिक्र किया कि भारत के सामने तात्कालिक चुनौती गरीबी नहीं, बल्कि धीमी होती इकोनॉमिक ग्रोथ और निवेशकों के टूटते मनोबल की है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें ग्लोबल संघर्षों के कारण बड़े पैमाने पर गरीबी के दोबारा लौटने का डर है तो भल्ला ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘लेकिन मेरा मानना है कि भारत के मामले में कुछ ऐसा हुआ है जिस पर हमें अपनी इकोनॉमिक ग्रोथ की प्रक्रिया के संदर्भ में चर्चा करनी चाहिए। निवेश नहीं हो रहा है। निजी निवेश नहीं हो रहा है। एफडीआई तो वास्तव में घटकर निगेटिव दायरे में चला गया है।’
WITH THANKS : NBT NEWS




