विज्ञान और हमारा मस्तिष्क का क्या सम्बन्ध है? जानिए
हमारे मस्तिष्क में लगभग 100 बिलियन न्यूरोन्स होते हैं जो आपस में लगभग 1000 ट्रिलियन कनेक्शन बनाते हैं।

विज्ञान और हमारा मस्तिष्क का क्या सम्बन्ध है? जानिए

हमारे मस्तिष्क में लगभग 100 बिलियन न्यूरोन्स होते हैं जो आपस में लगभग 1000 ट्रिलियन कनेक्शन बनाते हैं। एक अनुमान के अनुसार मिल्की वे आकाशगंगा में 100 से लेकर 400 बिलियन तक सितारे हो सकते हैं।

तो हम कह सकते हैं कि हमारे दिमाग़ में उतने ही न्यूरोन्स हैं जितने हमारी आकाशगंगा में सितारे। कॉसमॉस छोटेसे छोटे से लेकर बड़े से बड़े रूप में खुद को एक्सप्रेस करती है।

इतने सारे न्यूरोन्स और इतने सारे कनेक्शन हमारे मस्तिष्क की सोचने की क्षमता को असीमित बना देते हैं। हमारे मस्तिष्क की कोशिकाएं यानी न्यूरोन्स सूचना को प्रोसेस करने वाली बहुत ही सफल इलेक्ट्रो-केमिकल मशीने हैं। न्यूरोन कोशिका के अंदर पोटेशियम की मात्रा सोडियम से अधिक होती है और anions यानी ऋणात्मक आवेशित ions की संख्या ज्यादा होती है। अगर हम इसके अंदर एक छोटा सा इलेक्ट्रॉड रख दें तो यह रीडिंग देगा -70 मिलीवोल्ट। यानी आराम की अवस्था में न्यूरोन के अंदर ऋणात्मक आवेश रहता है।

लेकिन जैसे ही इसके पास किसी दूसरे न्यूरोन से सिग्नल आता है तो इसकी कोशिका भित्ति की permeability यानी पारगाम्यता बदल जाती है और बाहर से सोडियम न्यूरोन के अंदर चला जाता है। इस प्रक्रिया को हम कहते हैं Depolarization.

अगर यह depolarization एक विशेष स्तर तक पहुँच जाता है तो न्यूरोन का ऋणात्मक आवेश धनात्मक आवेश में बदल जाता है। अब इलेक्ट्रॉड की रीडिंग आएगी +40 मिलीवोल्ट। इसे हम न्यूरोन का Action Potential कहते हैं

इसके बाद यह धनात्मक आवेश पूरी कोशिका में फैल कर जाता है। एक विशेष समय के बाद दोबारा पोटेशियम चैनल खुल जाते हैं और पोटेशियम कोशिका से निकलने लगता है। अब दोबारा से न्यूरोन में ऋणात्मक आवेश आ जाता है। इस प्रक्रिया को repolarization कहते हैं। उसके बाद स्टेज आती है hyperpolarization और फिर restoration of resting stage जिसमें दोबारा पोटेशियम कोशिका में आ जाते हैं और सोडियम बाहर चले जाते हैं। उसके बाद दोबारा से फिर वही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
एक्शन पोटेन्शियल के बाद न्यूरोन अगले न्यूरोन को सिग्नल भेजता है और उस न्यूरोन में भी यही होता है। साथ ही एक न्यूरोन से दूसरे न्यूरोन में सिग्नल के ट्रांसफर होने की यह प्रक्रिया भी कुछ रसायनों व रासायनिक प्रक्रियाओं के जरिये ही होती है।

इस तरह से हमारा दिमाग़ सूचना ग्रहण करता है, सूचना भेजता है और सोचने व चेतन होने का काम करता है।
तो चेतना या माइंड या conciousness क्या है? हमारे भौतिक मस्तिष्क के अंदर मौजूद भौतिक न्यूरोन्स के अंदर और आपस में होने वाली भौतिक रसायनों की रासायनिक प्रक्रियाएं। यह चेतना लगभग 14 अरब वर्ष के कॉस्मिक और साढ़े 3 अरब के जैविक विकास का परिणाम है।
इसका मतलब है कि भौतिक पदार्थ से परे चेतना का कोई अस्तित्व नहीं होता क्योंकि उसके बिना ये भौतिक रासायनिक प्रक्रियाएं संभव ही नहीं हैं।
दुनिया में होने वाली किसी भी घटना का कोई न कोई आधार होता है, कोई वैज्ञानिक व्याख्या होती है। भले ही आज हमें उसके बारे में ज्ञान न हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह घटना भौतिक जगत से परे है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण होने का सबसे साधारण मतलब है कि हम किसी भी घटना या प्रक्रिया का वैज्ञानिक आधार जानने की कोशिश करें। हर तरह के दावे पर सवाल खड़ा करें और उसकी वैज्ञानिक व्याख्या करने या जानने की कोशिश करें। चीजों और घटनाओं को समझने का सबसे सही तरीका यही है।

तो यह हमें क्यों बता रहे हो?
कुछ नहीं ब्रो.. वह तो अध्यात्म और विज्ञान का सम्बन्ध बताने वाली कुछ रील्स देख ली थी तो सोचा…. यू नो..!!
साभार आलेख : लेखक *डॉ. नवमीत नव*




