जीवित्पुत्रिका व्रत का इतिहास और महत्व : PARWEZ
जीवित्पुत्रिका व्रत एक महत्वपूर्ण उपवास दिवस है.

जीवित्पुत्रिका व्रत एक महत्वपूर्ण उपवास दिवस है, जिसे माताएँ अपने बच्चों के सुखी और समृद्ध जीवन के लिए रखती हैं ¹। यह व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो कि भारत के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में ² ³.
जीवित्पुत्रिका व्रत का इतिहास और महत्व
इस व्रत का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है, जब भगवान कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में शिशु को अश्वत्थामा के प्रहार से बचाया था ². तब से, यह व्रत माताओं द्वारा अपने बच्चों की सलामती और समृद्धि के लिए रखा जाता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत की विधि
इस व्रत को तीन दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन निर्जला व्रत और तीसरे दिन पारण किया जाता है ². माताएँ अपने बच्चों की सलामती के लिए व्रत रखती हैं और भगवान की आराधना करती हैं ³.
जीवित्पुत्रिका व्रत का समय और प्रभाव
यह व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो कि भारत के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है ² ³. इस व्रत को रखने से माताओं को अपने बच्चों की सलामती और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है .
जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया या जीवित्पुत्र व्रत के नाम से भी जाना जाता है, अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत माताएँ अपने पुत्रों के सुखी और समृद्ध जीवन के लिए रखती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत 2024 की तिथि 25 सितंबर है। यह व्रत उत्तर भारत में, विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश में मनाया जाता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत के दौरान माताएँ अपने पुत्रों के लिए व्रत रखती हैं और पूजा-पाठ करती हैं। व्रत के दौरान माताएँ पीले धागे को अपने हाथ में बांधती हैं, जिसे जितिया कहा जाता है। यह धागा तब तक पहना जाता है जब तक वह पहनने लायक न हो।
जीवित्पुत्रिका व्रत का समय और पारण का समय
जीवित्पुत्रिका व्रत का समय अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है, जो कि 25 सितंबर 2024 को है। पारण का समय 4:58 PM पर होगा, जिसे माताएँ अपने व्रत को खोलेंगी।
जीवित्पुत्रिका व्रत किसी विशेष हिंदू देवता को समर्पित नहीं है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पुत्रों की लंबी आयु है। माताएँ स्नान और प्रार्थना के बाद व्रत शुरू करती हैं और पूरे दिन कुछ नहीं खातीं। आमतौर पर, जितिया व्रत समूह में किया जाता है और इसमें भजन और जीवित्पुत्रिका व्रत कथा का वर्णन होता है। व्रत से जुड़े अनुष्ठान क्षेत्र से क्षेत्र में भिन्न होते हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही है। जीवित्पुत्रिका व्रत एक माँ के अपने पुत्र के लिए अंतहीन प्रेम और स्नेह को दर्शाता है।
प्राचीन समय में, पुत्रों की आवश्यकता माताओं और परिवार में अन्य महिला सदस्यों की सुरक्षा के लिए थी। लेकिन समय बदल गया है और आज बेटियाँ भी समान रूप से सक्षम हैं और वही सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं जो एक पुत्र प्रदान करता है। लेकिन दुर्भाग्य से, समाज का एक बड़ा वर्ग अभी भी महिलाओं को बोझ मानता है और महिला भ्रूण हत्या को बढ़ावा देता है।




