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कलम दवात के अधिष्ठाता श्री चित्रगुप्त महाराज के पूजन एवं भाई बहन के स्नेह के पुण्य पावन पर्व भाई-दूज की अनेकानेक शुभकामनायें

प्रभात "श्रीवास्तव" *प्रधान शिक्षक* प्राथमिक विद्यालय मियाँ पकड़ी, मड़वन, मुजफ्फरपुर

JHVP BHARAT NEWS

चित्रगुप्त पूजा पर विशेष रचना : प्रभात श्रीवास्तव जी

*कायस्थों की गौरव गाथा*

*(आल्हा छंद)*

छंदकार – *सौरभ प्रभात*

 

शीश नवाकर गुरु चरणों में

करनी है नूतन शुरुआत।

कायस्थों की गौरव गाथा

लेकर आया आज प्रभात।।1।।

 

हस्त कलम की लेकर ताकत

जिनका उन्नत रहता भाल।

क्षेत्र सभी में झंडा गाड़ा

करता देखो नित्य कमाल।।2।।

 

शौर्य अमिट वाणी में जिनके

सादा जीवन उच्च विचार।

ज्ञान प्रभा मोती माणिक से

सजता नित जिनका दरबार।।3।।

 

विश्व पटल पर शोभा पाते

कितने ही बैठे चित्रांश।

जिनके बिन हर कार्य अधूरा

सुन लो तुम उनका सारांश।।4।।

 

मसि अवलेखा संगी जिनके

सुन लो उनका आविर्भाव।

धारा से जो पार लगाते

तूफानों में फँसती नाव।।5।।

 

ब्रह्मा की काया से जन्में

लेकर कागज और दवात।

यमपुर में फिर डाला डेरा

जन्म मरण लिखते दिन रात।।6।।

 

मेधा का है सागर जिनमें

*चित्रगुप्त* है उनका नाम।

वेदों की महिमा को थामे

लिखते निशदिन हो अविराम।।7।।

 

दो पत्नी से जन्मे इनके

कुल में कुल बारह संतान।

फैले जग को पोषित करने

कर्म अटल करने संधान।।8।।

 

इन बारह की संतति से ही

कायस्थों का चलता वंश।

हस्त कलम सह मेधा उत्तम

लेकर जन्मा इनका अंश।।9।।

 

विश्व पटल पर शोभित हैं जो

ऐसा एक विवेकानंद।

कीर्ति पताका फहरे उनकी

गाथा गायें सारे छंद।।10।।

 

संत शिरोमणि बन कर छाये

धर्म सनातन कर विस्तार।

पौरुष प्रज्ञा के संगम वे

सत्य सदा करते स्वीकार।।11।।

 

चिंतन को करते परिभाषित

चिंता को दे फेंक उखाड़।

ऐसी वाणी सुन युवकों ने

आज दिये हैं झंडे गाड़।।12।।

 

राष्ट्र सुवासित इनके दम से

ऐसे संत विवेकानंद।

भगवा को आधार बनाकर

पुष्पों को देते मकरंद।।13।।

 

मन उपवन को सुरभित करती

जैसे होली वाली फाग।

हास्य सरस से जीवन रचते

*तानसेन* के अनुपम राग।।14।।

 

अकबर के नवरत्नों में थे

लय तालों के ये मर्मज्ञ।

उपमा उपमानों से ऊपर

सुर सरिता के थे तत्वज्ञ।।15।।

 

दीपक राग जलाता इनका

बारिश में गूँजे मल्हार।

ठुमरी से सजता था गायन

राग ध्रुपद पर बन उपकार।।16।।

 

जीरादेई की पावन भू में

जन्मे थे बाबू राजेन्द्र।

ऐसा शासन कर दिखलाया

कर न सके थे जो देवेन्द्र।।17।।

 

भारत के गणतंत्र पटल का

था वो हीरा एक अमूल्य।

व्यक्ति प्रथम का गौरव पाया

कोई न हुआ उसके तुल्य।।18।।

 

संवैधानिक कदम उठाया

जब भी संकट आया घोर।

नीति नियम से राष्ट्र चलाया

भागे डर कर सारे चोर।।19।।

 

व्यापक था व्यक्तित्व अनोखा

स्वार्थ रहित जीवन आधार।

गात सुकोमल भाव मृदुल पर

दुष्कर कार्य किये साकार।।20।।

 

भूमि बनारस की वो पावन

गुदड़ी में जन्मा था लाल।

छोटा सा था कद उसका पर

करता था वह नित्य कमाल।।21।।

 

लाल बहादुर कहलाया वो

जनसेवा उसकी पहचान।

सिद्धांतों का पुतला था जो

राष्ट्र हितों पर देता जान।।22।।

 

शक्ति निहित आत्मा में होती

इसका था वो एक प्रमाण।

दुर्लभ काज सुगम हो जाते

साँसें जब बन जाती शाण।।23।।

 

नेक इरादा स्वच्छ नियत थी

और जड़ाऊ उनका ज्ञान।

शास्त्री जी की महिमा गाता

देखो सारा हिन्दुस्तान।।24।।

 

वीर सुभाष कटक में जन्मा

भारत भू को करता शक्त।

आजादी उपहार मिलेगी

मुझको जो तुम दो निज रक्त।।25।।

 

नेताजी कहलाने वाला

था वो योद्धा ऐसा वीर।

पाँव जहाँ अड़ते थे उसके

तरकश से डरता था तीर।।26।।

 

हिंद सदा बसता मन आँगन

साहस से सजता था गात।

शौर्य पराक्रम ओज भरा उर

देता अरि को हरदम मात।।27।।

 

भारत के स्वातंत्र्य समर का

अद्भुत चमका गौरव भाल।

राष्ट्र कहे हर कोख पले फिर

वीर शिरोमणि ऐसा लाल।।28।।

 

बलिया की धरती से निकला,

जे०पी० नाम किया साकार।

साथ विपक्षी दल का देकर,

गढ़ता था भारत सरकार।।29।।

 

आंदोलन से गहरा नाता,

जनता का मिलता था साथ।

शासन जो गलती कर बैठे,

कान पकड़ देता दो हाथ।।30।।

 

भारत के भू लोक धरा का,

नायक वो ऐसा रणधीर।

क्रांति पुरुष बन चमका नभ में,

उपमा देते राष्ट्र प्रवीर।।31।।

 

पुनरुत्थान जगत का करने

आया भू पर मोहन राय।

राजा नाम सुहाता उसका,

वीर प्रवर था वो अतिकाय।।32।।

 

ब्रह्म समाज ध्वजा संस्थापक,

भाषाओं का अद्भुत ज्ञान।

नवयुग के निर्माण चला वो,

बंग धरा से शर संधान।।33।।

 

धार्मिक सामाजिक उद्भव में,

वैचारिक था उसका बोध।

रूढ़ प्रथा से लड़ जाने को

नित्य नये करता था शोध।।34।।

 

बाल विवाह सती उन्मूलन,

पर्दा परिपाटी का अंत।

गर्व बढ़ाता सौष्ठव जिसका,

करता नित शुभ कर्म अनंत।।35।।

 

भारत के पहले वैज्ञानिक,

क्रेस्कोग्राफी के थे ईश।

भौतिकशास्त्री जैव वनस्पति,

के ज्ञाता थे बसु जगदीश।।36।।

 

*खुदीराम* की देख शहादत,

भूमि मुज़फ्फरपुर की धन्य।

भगवद् गीता ले फाँसी चढ़ता

जिसके भू पर शौर्य अनन्य।।37।।

 

सबसे छोटी वय का योद्धा,

माने है जिसको इतिहास।

स्मारक उस वीर लला का,

स्थित है मेरे घर के पास।।38।।

 

जिसके दर पर लगता मेला

शीश नवाता भारत देश।

तात कहें सुत फिर से आओ

बदलो जग का ये परिवेश।।39।।

 

लमही की पावन माटी में,

जन्मा था वो धनपत राय।

साहित्यिक पन्नों पर जिसके,

सर्व प्रथम छपते अध्याय।।40।।

 

अवलेखा का जादूगर वो,

पात्र नये गढ़ता था नित्य।

पन्नों पर साकार किया तब,

ठग दारोगा नृप अरि भृत्य।।41।।

 

आदर्शोन्मुख सत्य सजाता,

और दिखाता जग विभ्राट।

लेख उपन्यासों की सेना,

लेकर बन बैठा सम्राट।।42।।

 

मुंशीजी को पढ़कर जानो,

लिखने का क्या होता अर्थ?

क़िस्सागोई खेल नहीं है,

कर लो तुम उनका अन्वर्थ।।43।।

 

अधुना की मीरा कहलातीं,

कवयित्री वो एक सशक्त।

नाम महादेवी वर्मा था,

राष्ट्र हितों की थीं वो भक्त।।44।।

 

महिलाओं की दीन दशा पर,

बोल खड़े में रचती काव्य।

उनके अक्षर पाकर सागर,

बन जाता फिर यूँ ही नाव्य।।45।।

 

शब्द उठा संस्कृत बांग्ला से,

गढ़ती कोमल हिन्दी वेश।

नाद प्रमाद व पैनेपन से,

सींच रही थी जग परिवेश।।46।।

 

भाव प्रवर कृति शैली उत्तम,

लय ज्ञाता वो संगीतज्ञ।

दक्ष चितेरिन लोक प्रिया थी,

है अब जिसका राष्ट्र कृतज्ञ।।47।।

 

पन्त निराला राखी भाई,

और सुभद्रा जिसकी मित्र।

बोल महादेवी के गूँजे,

और हज़ारी छिड़के इत्र।।48।।

 

मधुबाला का चित्त चकोरा,

मधुशाला का प्रिय वो अंश।

और हलाहल लिखता निशदिन,

न्यारा था बच्चन हरिवंश।।49।।

 

गीत ग़ज़ल कविता की वाणी,

सुमधुर सज्जित रस की खान।

क्या भूलूँ क्या याद करूँ के,

लेखक को अब तू पहचान।।50।।

 

ओथेलो हो या जनगीता,

बच्चन लिखते विविधा भाव।

पाठक हो उन्मत्त सुने फिर,

सौम्य रुबाई को ले चाव।।51।।

 

इनके एक सुपुत्र अनोखे,

नाम पड़ा जिनका अमिताभ।

बॉलीवुड के रत्न शिरोमणि,

फिल्मी दुनिया के मुक्ताभ।।52।।

 

ओजस्वी वाणी के स्वामी,

नायक खलनायक अनमोल।

कितने ही सम्मान मिले हैं,

गणना कौन करेगा बोल।।53।।

 

चलचित्रों की दुष्कर दुनिया,

कदमों के है नीचे आज।

शील गुणों के तुंग शिखर ये,

जनता के उर करते राज।।54।।

 

अभिनेता हैं निर्माता हैं,

गायक भी ये आज महान।

प्रस्तोता हैं सांसद भी हैं,

और करूँ कितना गुणगान।।55।।

 

एक बिहारी सब पर भारी,

सिंह गरज सम लेता श्वास।

सिन्हा वो शत्रुघ्न लला है,

शैली जिसकी है बिंदास।।56।।

 

सोनाक्षी है पुत्री इनकी,

नित्य बढ़ाती इनकी शान।

इनकी अभिनय की क्षमता को,

देती निशदिन नव पहचान।।57।।

 

कौशल गर्वित ही करता है,

लाख टके की सुन लो बात।

छोटी सी नगरी का वासी,

वरना कैसे दे जग मात।।58।।

 

कट्टर हिन्द मराठी मानुष,

बाला साहब नामक शेर।

नाम सुने जब दुनिया वाले,

पल में हो जाते हैं ढ़ेर।।59।।

 

शिव सेना के जो संस्थापक,

हिंदू के हैं हिय सम्राट।

कौन हुआ जग में फिर ऐसा,

बन पाता जो उनकी काट।।60।।

 

तेज अलौकिक मुखमंडल पर,

वाणी जैसे सिंह दहाड़।

एक कदम से लहरें डरतीं,

और खिसकता धीर पहाड़।।61।।

 

बाला साहब की गाथा का,

मिलता न कहीं कोई अंत।

आत्मा में उन्माद भरा था,

भगवा ओढ़े दिखता संत।।62।।

 

हास्य कला अभिनेता है वो,

नाम कमाया जग में खूब।

बात हँसी के सागर जैसी,

श्रोता जाते उसमें डूब।।63

 

व्यंग्य ठिठोली करना निशदिन,

राजू श्रीवास्तव की शान।

लंबा पतला हँसमुख सा वो,

याद करो उसकी पहचान।।64।।

 

लुधियाना में जोरावर के,

घर में जन्मा चंद्र मुकेश।

माथुर कुल का कुलगौरव था,

यक्ष सुरों सम था देवेश।।65।।

 

मेरा जूता है जापानी,

याद करो कुछ इसके बोल।

मैं पल दो पल का शायर हूँ,

गीत बना कितना अनमोल।।66।।

 

हिन्दी चलचित्रों में फिर से,

पार्श्व गवैया होगा कौन।

जिसके स्वर को सुनकर दुनिया,

हो जाती है अब भी मौन।।67।।

 

जाने कितने प्रीत सजाये,

और दिखाई उर की पीर।

पल में ही मुस्कान जगाया,

और किया पल में गंभीर।।68।।

 

गानों के उस ताज़महल का,

पत्थर वो सबसे उत्कृष्ट।

स्वर लहरी में जिसके डूबी,

रहती नित दुनिया आकृष्ट।।69।।

 

गायक अभिनेता का संगम,

था वो सहगल कुंदन लाल।

जम्मू के इस सौम्य पुरुष का,

आओ जाने थोड़ा हाल।।70।।

 

गीत सुरीले आतप हरते,

अभिनय लाये मुख मुस्कान।

बीत गये हैं दशकों फिर भी,

झूम रहा है हिन्दुस्तान।।71।।

 

क्षमताओं का कोष वृहत था,

और गुणों का था भंडार।

चलचित्रों के भूषण वन का,

रत्न जड़ाऊ था वो हार।।73।।

 

राजा टोडरमल को देखो,

अकबर नवरत्नों की शान।

सूझ समझ मेधा की बातें,

प्रज्ञ कुशल करता विद्वान।।74।।

 

विद्यार्थी की बात कहूँ कुछ,

धर्मपरायण थे प्रभुभक्त।

भाव सरल पर क्रोधी माथा,

वक्ता भी थे कितने शक्त।।75।।

 

कर्म गिनाऊँ कितनों का ही,

विश्व प्रसिद्ध हुये विख्यात।

ऐसे भी कुछ नाम हुये पर,

जग मे जो सबसे कुख्यात।।75।।

 

ठग सम्राट कहाने वाला,

एक हुआ था नटवर लाल।

तर्क प्रभावी और विदूषक,

थी कुत्सित पर जिसकी चाल।।76।।

 

ताज़महल को लालकिले को,

बेचा उसने कितनी बार।

राष्ट्र प्रमुख का आलय बेचा,

बेच दिया था संसद द्वार।।77।।

 

था अनुकृति में सिद्ध निपुण वो,

बात बनाने में प्रख्यात।

जिसको देखा उसको लूटा,

ठग विद्या सब उसको ज्ञात।।78।।

 

देश विदेश भ्रमण कर उसने,

लूट लिये कितने दरबार।

नाक चने चबवाये सबसे,

छीन लिया था चैन करार।।79।।

 

अपहरणों का नृप कहलाया,

काली दुनिया का सरताज।

जिसके डर से थर थर काँपे,

सभ्य धनिक वो धीर समाज।।80।।

 

बबलू श्रीवास्तव की गाथा,

एक समय थी जग सिरमौर।

धमकी और फिरौती उसके,

नित्य सुबह के थे दो कौर।।81।।

 

शौर्य पराक्रम कूट भरा था,

किंतु दिशा पकड़ी कुछ और।

नाम डुबाया कायस्थों का,

हाथ नहीं फिर आया ठौर।।82।।

 

यूपी की धरती भी कहती,

राजू भटनागर के कांड।

कोख कभी क्यों मेरी जन्मा,

क्रूर अधम वो पापी भाँड।।83।।

 

अपहर्ता वो दुष्ट नराधम,

बच्चे बूढ़े सब का काल।

जिसके भय से सूख गये थे,

सागर बादल नदियाँ ताल।।84।।

 

अपराधों के दलदल पैठा,

भूल गया वो निज संस्कार।

जाति कलंकित कर बैठा वो,

गुरु द्रोही निर्लज्ज अपार।।85।।

 

क्षेत्र सभी लहराया परचम,

नाद समान किया जयकार।

सत्य असत्य रहे जैसे भी,

निज गुण में सब वीर कटार।।86।।

 

चाहे हो चातुर्य चपलता,

या फिर कोई गाथा शौर्य।

कायस्थों की सुन कर वाणी,

शीश झुकाता शासन मौर्य।।87।।

 

रणभेरी स्वातंत्र्य समर की,

या हो झूठा जाल प्रपंच।

हास्य कला का हो संगम या,

अभिनय का ऊँचा हो मंच।।88।।

 

बातें हो साहित्य कथा की,

चाहे अपराधों का योग।

निर्धनता की पीर पुरानी,

चाहे हो फिर छप्पन भोग।।89।।

 

आग धधकती थी सीने में,

और उबलता गाढ़ा रक्त।

उस भट्ठी में तपकर मेधा,

लौह समान बनी थी शक्त।।90।।

 

नित्य सफलता की चोटों से,

शैल शिखा से फूटी ज्योत।

मरु जो सूखा निर्जन था वो,

बन बैठा जलधारा स्त्रोत।।91।।

 

प्रज्ञ प्रवीण प्रभावी परिचय,

पंकज पुष्कर पुण्य प्रतीक।

अविचल अविरल अनुसंधानी,

अनुगामी अवधूत अनीक।।92।।

 

कुंदन सा तपता जाता है,

और निखरता रूप अनंत।

गौरवशाली भारत भू का,

वीर प्रबुद्घ हुआ अत्यंत।।93।।

 

शेष कहानी कितनी ही हैं,

लिख पाया न जिसे इतिहास।

बुद्धि विवेक विजय का लेखा,

मिलता जो न किसी के पास।।94।।

 

गहरे सागर के भीतर जा,

ढूँढी है इतनी सब बात।

कायस्थों का संवाहक बन,

देता हूँ सबको सौगात।।95।।

 

भूल न जाना इन नामों को,

कुलदीपक ये वंश कुलीन।

जो वंशज इस वृक्ष लता के,

द्वार विजय के धीर अलीन।।96।।

 

उद्भव और विलय की वेला,

तो है उस ईश्वर के हाथ।

कर्मों से पहचान बनाना,

कुल का मान बढ़ाना साथ।।97।।

 

*चित्रगुप्त* की दृष्टि कृपा थी,

*मातु शारदा* का आशीष।

कायस्थों की कुल गाथा को,

लिख पाया जो निम्न करीष।।98।।

 

गुरु चरणों का वंदन करता,

नित्य नियम से बारम्बार।

छंद शतक की पूरी माला,

उनकी आशीषों का सार।।99।।

 

छंद पटल गणमान्य समीक्षक,

वंदन अभिनंदन अविराम।

सौरभ हर्षित होकर करता,

सबको शत शत कोटि प्रणाम।।

साभार संकलन / JHVP BHARAT NEWS

✍🏻©️ *सौरभ प्रभात*

*प्रधान शिक्षक एवं कवि*

*प्राथमिक विद्यालय मियाँ पकड़ी*

*मड़वन, मुजफ्फरपुर*

JHVP BHARAT NEWS

Parwez Alam: Editor in chief : JHVP BHARAT NEWS : A Passionate Soul with a Drive for Change Born on January 26, 1983, Parwez Alam is a dynamic individual with a multifaceted personality. With a postgraduate degree in hand, Parwez has always been drawn to the world of journalism and social work, driven by a desire to make a positive impact on society. When he's not working, Parwez indulges in his favorite hobby - cricket. An avid player, he finds solace in the thrill of the game. But that's not all - Parwez is also a creative force to be reckoned with. He enjoys writing stories, composing poems, and expressing himself through words. Parwez's passion for social justice is evident in his work as a political activist. He is an outspoken advocate for change and uses his voice to raise awareness about important issues. In today's digital age, he leverages social media platforms to spread his message and connect with like-minded individuals. Through his various pursuits, Parwez Alam embodies the spirit of a true change-maker. His dedication to journalism, social work, and political activism is inspiring, and his creative side makes him a unique and fascinating individual. 9931481554, 9709287354,6202433405,9097947125,7870527125

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